Tuesday, 12 December 2017

एक खत मैंने लिखा है जिंदगी का,
दोस्तों मैं दस्तखत हूं इस सदी का ।
बात है कुछ जो अभी तुमसे जुड़ा हूं,
हो गया होता अलग वरना कभी का ।
लोग अपने पाँव पर चलते रहें तो,
फिर नहीं लेंगे सहारा पालकी का।
मैं अंधेरे रास्ते का दीप खुद हूं,
मैं नहीं मोहताज तेरी रौशनी
का ।
आप कितने भी कुशल तैराक हों पर,
देख ही लें फासला तट से नदी का ।
आज मेरा आईना जो हो गया है,
हो गया फिर आईना मैं भी उसी का ।"
लेखक- SURYA PRAKASH SINGH SIR

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